नई दिल्ली | शुक्रवार
सुप्रीम कोर्ट ने मासिक धर्म स्वच्छता को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा बताते हुए सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि वे कक्षा 6 से 12 तक की छात्राओं को हर स्कूल में मुफ्त सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराएं। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि मासिक धर्म प्रबंधन से जुड़ी सुविधाओं का अभाव बालिकाओं की शिक्षा, गरिमा और समानता के अधिकार को प्रभावित करता है।
127 पन्नों के फैसले में अदालत ने स्पष्ट किया कि पीरियड्स किसी लड़की की पढ़ाई बाधित नहीं कर सकते। पीठ ने कहा कि राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी है कि वह स्कूलों में ऐसी व्यवस्थाएं सुनिश्चित करे, जिससे छात्राएं बिना बाधा के शिक्षा में भाग ले सकें।
क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने
अदालत ने कहा कि मासिक धर्म स्वच्छता केवल स्वास्थ्य का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह गरिमा, गोपनीयता और समान अवसर से सीधे जुड़ा विषय है। फैसले में कहा गया कि सैनिटरी पैड, स्वच्छ शौचालय और सुरक्षित निपटान की सुविधा न होने से छात्राएं स्कूल में अनुपस्थित रहती हैं या पढ़ाई छोड़ने को मजबूर होती हैं। यह स्थिति शिक्षा के अधिकार को कमजोर करती है।
पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि जीवन का अधिकार केवल अस्तित्व तक सीमित नहीं है, बल्कि सम्मानजनक जीवन जीने की शर्तें भी इसमें शामिल हैं।
सभी स्कूलों में अलग शौचालय अनिवार्य
सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी और निजी दोनों प्रकार के स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग शौचालय अनिवार्य करने का निर्देश दिया। अदालत के मुताबिक, इन शौचालयों में पर्याप्त पानी, साबुन से हाथ धोने की सुविधा, नियमित सफाई और दिव्यांग बच्चों के लिए अनुकूल व्यवस्था होनी चाहिए।
इसके अलावा, हर शौचालय में ढके हुए कूड़ेदान लगाए जाने और उनकी नियमित सफाई सुनिश्चित करने को कहा गया है, ताकि सैनिटरी कचरे का सुरक्षित प्रबंधन हो सके।
फ्री सैनिटरी पैड और वेंडिंग मशीन
अदालत ने निर्देश दिया कि स्कूलों में ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन मुफ्त उपलब्ध कराए जाएं। ये पैड शौचालय परिसर में वेंडिंग मशीनों के जरिए या किसी निर्धारित स्थान पर रखे जाएंगे। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि छात्राओं को मासिक धर्म के दौरान किसी प्रकार की असुविधा न हो।
ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियमों के अनुसार सैनिटरी नैपकिन के पर्यावरण अनुकूल और सुरक्षित निपटान की व्यवस्था भी अनिवार्य की गई है।
मासिक धर्म प्रबंधन कॉर्नर की स्थापना
हर स्कूल में मासिक धर्म प्रबंधन कॉर्नर स्थापित करने के निर्देश दिए गए हैं। इन कॉर्नरों में अतिरिक्त अंतर्वस्त्र, यूनिफॉर्म, डिस्पोजेबल बैग और अन्य आवश्यक सामग्री उपलब्ध होगी। अदालत ने कहा कि यह व्यवस्था विशेष रूप से आपात स्थिति में छात्राओं की मदद के लिए की जा रही है।
पीठ के अनुसार, ऐसी सुविधाएं छात्राओं को आत्मविश्वास के साथ स्कूल में बने रहने में मदद करेंगी।
पाठ्यक्रम और शिक्षकों का प्रशिक्षण
सुप्रीम कोर्ट ने NCERT और राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषदों को निर्देश दिया कि वे पाठ्यक्रम में मासिक धर्म, यौवन और संबंधित स्वास्थ्य मुद्दों पर लैंगिक संवेदनशील सामग्री शामिल करें। अदालत ने कहा कि इससे मासिक धर्म से जुड़ी सामाजिक वर्जनाओं को तोड़ने में मदद मिलेगी।
साथ ही, सभी शिक्षकों—पुरुष और महिला—को मासिक धर्म स्वच्छता पर संवेदनशील बनाने और प्रशिक्षण देने के निर्देश दिए गए हैं। उन्हें यह सिखाया जाएगा कि मासिक धर्म के दौरान छात्राओं को किस तरह सहयोग दिया जाए।
शिक्षा, गरिमा और गोपनीयता का अधिकार
फैसले में कहा गया कि स्वच्छ शौचालय और सैनिटरी सुविधाओं की कमी से छात्राओं की गरिमा प्रभावित होती है। गरिमा का अर्थ ऐसी परिस्थितियों से है, जहां व्यक्ति बिना अपमान या अनावश्यक पीड़ा के जीवन जी सके।
अदालत ने यह भी कहा कि गोपनीयता गरिमा से अटूट रूप से जुड़ी है। राज्य का दायित्व केवल गोपनीयता का उल्लंघन न करना ही नहीं, बल्कि उसकी रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाना भी है। मासिक धर्म प्रबंधन की अनुपलब्धता स्कूलों में समान शर्तों पर भागीदारी के अधिकार को छीन लेती है।
निगरानी और अनुपालन की व्यवस्था
सुप्रीम कोर्ट ने जिला शिक्षा अधिकारियों को स्कूलों के बुनियादी ढांचे का वार्षिक निरीक्षण करने का निर्देश दिया है। इसके तहत छात्राओं से गुमनाम फीडबैक लेने के लिए विशेष सर्वेक्षण कराए जाएंगे।
राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग और राज्य बाल अधिकार आयोगों को निर्देशों के क्रियान्वयन की निगरानी की जिम्मेदारी सौंपी गई है। अनुपालन न करने पर कार्रवाई का प्रावधान भी रखा गया है। निजी स्कूलों की मान्यता रद्द की जा सकती है, जबकि सरकारी संस्थानों में विफलता के लिए राज्य सरकारों को सीधे जवाबदेह ठहराया जाएगा।
जया ठाकुर की याचिका पर आया फैसला
यह फैसला सामाजिक कार्यकर्ता जया ठाकुर की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनाया गया। याचिका में केंद्र की ‘स्कूल जाने वाली लड़कियों के लिए मासिक धर्म स्वच्छता नीति’ को पूरे देश में लागू करने की मांग की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में 10 दिसंबर 2024 को फैसला सुरक्षित रखा था।
अदालत ने नवंबर 2023 की उस घटना का भी उल्लेख किया, जिसमें हरियाणा के महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय में तीन महिला सफाई कर्मचारियों से मासिक धर्म साबित करने के लिए सैनिटरी पैड की तस्वीरें भेजने को कहा गया था। इस घटना पर कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया था।
आगे क्या होगा
सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को तीन महीने के भीतर अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है। अदालत ने निर्देशों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए सतत आदेश (कंटिन्यूइंग मैंडेमस) जारी किया है।
फैसले में कहा गया कि यह निर्देश केवल कानूनी औपचारिकता नहीं हैं, बल्कि उन छात्राओं के लिए हैं जो मदद मांगने में संकोच करती हैं, और उन शिक्षकों के लिए हैं जो संसाधनों के अभाव में सहायता नहीं कर पाते। अदालत के अनुसार, इन निर्देशों का उद्देश्य स्कूलों को छात्राओं के लिए सुरक्षित, समावेशी और सम्मानजनक बनाना है।
न्यूज सोर्स: ABP लाइव, लाइवलॉ, बार एंड बेंच, PTI

