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सुप्रीम कोर्ट ने UGC समानता नियम 2026 पर लगाई रोक, अस्पष्टता और दुरुपयोग की आशंका जताई

सुप्रीम कोर्ट ने UGC समानता नियम 2026 के क्रियान्वयन पर रोक लगाई, 2012 के नियम अंतरिम रूप से लागू English (optional):

नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट द्वारा UGC समानता नियम 2026 पर अंतरिम रोक से जुड़ा दृश्य।

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नई दिल्ली | 30 जनवरी 2026

सुप्रीम कोर्ट ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने वाले नियम, 2026 के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगा दी है। अदालत ने कहा कि ये नियम प्रथम दृष्टया अस्पष्ट हैं और इनके दुरुपयोग की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार और UGC को नोटिस जारी करते हुए अगली सुनवाई 19 मार्च 2026 को तय की है। तब तक 2012 के पुराने UGC नियम लागू रहेंगे।

मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति ज्वायमाल्या बागची की पीठ ने यह आदेश देश के विभिन्न हिस्सों से दायर याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान दिया। याचिकाओं में नए नियमों को मनमाना, भेदभावपूर्ण और संविधान विरोधी बताया गया है।

क्या है मामला

UGC ने 13 जनवरी 2026 को उच्च शिक्षण संस्थानों में जातीय भेदभाव रोकने और समान अवसर सुनिश्चित करने के उद्देश्य से नए नियम अधिसूचित किए थे। इन नियमों के तहत विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में समान अवसर केंद्र स्थापित करना अनिवार्य किया गया था।

हालांकि नियमों की अधिसूचना के बाद ही इनके विरोध में छात्र संगठनों और सामाजिक समूहों ने प्रदर्शन शुरू कर दिए। आरोप लगाया गया कि नियमों में जातीय भेदभाव की परिभाषा अधूरी है और इससे सामान्य वर्ग के छात्रों के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।

जातीय भेदभाव की परिभाषा पर सवाल

नए नियमों के नियम 3(1)(c) के तहत जातीय भेदभाव को केवल अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के खिलाफ भेदभाव तक सीमित किया गया है। याचिकाकर्ताओं ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन बताया।

याचिकाओं में तर्क दिया गया कि नियमों के नियम 3(1)(e) में पहले से ही भेदभाव की व्यापक परिभाषा मौजूद है, जिसमें धर्म, नस्ल, जाति, लिंग और जन्मस्थान शामिल हैं। इसके बावजूद जातीय भेदभाव की अलग और सीमित परिभाषा देना असंगत है।

सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणियां

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने टिप्पणी की,

“हम जिस जातिविहीन समाज की ओर बढ़ रहे थे, क्या हम उससे पीछे जा रहे हैं?”

अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि जब भेदभाव की व्यापक परिभाषा पहले से मौजूद है, तो जातीय भेदभाव की अलग परिभाषा की आवश्यकता क्यों पड़ी। पीठ ने कहा कि कानून की भाषा स्पष्ट और संतुलित होनी चाहिए, ताकि किसी वर्ग के साथ अन्याय न हो।

रैगिंग को बाहर रखने पर भी आपत्ति

अदालत ने नए नियमों में रैगिंग को शामिल न किए जाने पर भी सवाल उठाया। याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि शिक्षण संस्थानों में उत्पीड़न के कई मामले जूनियर और सीनियर के बीच रैगिंग से जुड़े होते हैं।

यह दलील दी गई कि यदि सामान्य वर्ग का कोई छात्र किसी आरक्षित वर्ग के सीनियर द्वारा रैगिंग का शिकार होता है, तो नए नियमों में उसके लिए कोई स्पष्ट उपाय नहीं है। अदालत ने माना कि इस पहलू को नजरअंदाज करने से नियमों का दायरा सीमित हो जाता है।

2012 के नियम बहाल, अनुच्छेद 142 का प्रयोग

सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत विशेष अधिकारों का प्रयोग करते हुए 2012 के UGC नियमों को अंतरिम रूप से बहाल कर दिया। पीठ ने कहा कि नियामक शून्य से बचने के लिए यह कदम जरूरी है।

वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने अदालत को बताया कि 2012 के नियम पहले ही निरस्त किए जा चुके हैं। इस पर अदालत ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 142 के तहत दिए गए निर्देश अगले आदेश तक प्रभावी रहेंगे।

रोहित वेमुला और पायल तडवी मामला बना पृष्ठभूमि

UGC के 2026 नियमों की पृष्ठभूमि 2019 में दायर एक जनहित याचिका से जुड़ी है। यह याचिका रोहित वेमुला और पायल तडवी की माताओं ने दायर की थी। दोनों छात्रों ने कथित जातीय भेदभाव के बाद आत्महत्या कर ली थी।

उस समय सुप्रीम कोर्ट ने उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव से निपटने के लिए प्रभावी तंत्र बनाने के निर्देश दिए थे। UGC ने विभिन्न हितधारकों से सुझाव लेकर नए नियम तैयार किए थे, लेकिन अधिसूचना के बाद ही इन पर विवाद शुरू हो गया।

बढ़ती शिकायतें और UGC के आंकड़े

UGC के अनुसार, 2019-20 से 2023-24 के बीच विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जाति आधारित भेदभाव की शिकायतों में 118.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। ये आंकड़े संसदीय समिति और सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किए गए थे।

विशेषज्ञों का मानना है कि ये आंकड़े शैक्षणिक संस्थानों में भेदभाव की गंभीरता को दर्शाते हैं। इसी आधार पर नए नियमों की आवश्यकता महसूस की गई थी।

राजनीतिक और सार्वजनिक प्रतिक्रिया

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर राजनीतिक दलों की मिश्रित प्रतिक्रिया सामने आई। कांग्रेस, BSP और TMC ने अदालत के फैसले का स्वागत किया। वहीं CPI(ML) लिबरेशन ने अदालत की टिप्पणियों पर आपत्ति जताई।

केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा कि रोके गए नियम विभाजनकारी थे। समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी नियमों की भाषा और उद्देश्य को स्पष्ट करने की जरूरत बताई।

आगे क्या

अदालत ने केंद्र सरकार और UGC को 19 मार्च 2026 तक अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। इस बीच सरकार नियमों की समीक्षा और संभावित संशोधन पर विचार कर सकती है।

सूत्रों के अनुसार, जातीय भेदभाव की परिभाषा को व्यापक बनाने और झूठी शिकायतों से निपटने के लिए स्पष्ट तंत्र जोड़ने पर चर्चा हो सकती है। तब तक देशभर के उच्च शिक्षण संस्थानों में 2012 के नियमों के तहत ही शिकायतों का निपटारा किया जाएगा ।

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